Shakuntala Devi Film Review: विद्या बालन की दमदार एक्टिंग, एक गणितज्ञ की जीवनी!

शकुंतला देवी की कहानी!

शकुंतला देवी का बचपन, जवानी, वृद्धा अवस्था तक साल 1934 से 2000 तक के सफर में दिखाया गया है। महज पांच साल में ही उनके सफर की शुरुआत हो गई थी, बड़े से बड़े सवाल जब वो मैथ्स के भी मुंह जुबानी सॉल्व कर देती थीं। स्कूल जा कर वह पढ़ना चाहती थीं, मगर उनके बेरोजगार पिता ने शकुंतला की इस प्रतिभा के शोज कराने लग गए। पैसा मिलने लगा इससे परिवार को और शकुंतला देवी की पूरे शहर में प्रसिद्धि हो गयी.. धीरे धीरे फिर देश में और इसके बाद विश्व भर में फेमस हो गयी। शकुंतला देवी अपने परिवार से दूर होती गयी, कारण था उनका आजाद ख्याल और निर्भीक स्वभाव। उनको खासकर अपने मां के लिए एक गुस्सा था क्योंकि उनकी माँ ने पिता के गलत आदतों को सहने में लाइफ निकाल दी।

pic credit: Amazon prime video instagram

शकुंतला देवी का रिश्ता इधर अंकों के साथ हर दिन डीप होते चला जा रहा था। गणित के सवालों को कंप्यूटर से भी तेज सॉल्व करने वाली इंसान के रूप में उनका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हुआ था। दुनिया उन्हें इस अचीवमेंट के बाद ‘ह्यूमन कंप्यूटर’ के नाम से बुलाने लगी। मगर जितनी आसानी से वो मैथ्स के सवाल सॉल्व कर देती थीं, शकुंतला देवी का पर्सनल लाइफ उतनी ही उलझा हुआ था। ‘नॉर्मल’ रहना उन्हें पल्ले नहीं पड़ता था। पेड़ों और इंसानों में असल फर्क ये है कि इंसान एक जगह पर नही रह सकता है, लेकिन पेड़ अपने जड़ों से बंधे होते हैं। व्यक्तिगत जीवन में इसी थ्योरी की वजह से वह अपनी बेटी से प्यार, सम्मान ना पाना उन्हें बेचैन करता रहता है। शकुंतला देवी के अंदर अक्सर तकरार चलता ही रहता है- और ये तकरार होता है कर्तव्यों, सिद्धांतों, और आकांक्षाओं के बीच। किस तरह इन सब से वो उबरती हैं, फिल्म में यही दिखाया गया है।

pic credit: Amazon prime video instagram

फ़िल्म में अभिनय

विद्या बालन शकुंतला देवी के किरदार में समाहित हो गई हैं। किरदार को उन्होंने स्टार्टिंग से लास्ट तक इतना बेहतरीन तरीके से निभाई है कि आपको कही से नही लगेगा कि कोई और है आपकी नजरों के साथ साथ शकुंतला देवी की सोच को भी बांधे रखती हैं। एक पल में हँसी, अगले ही पल में गुस्सा.. बतौर दर्शक विद्या बालन के हाव भाव इंटरेस्टिंग लगेंगे। जवानी से लेकर बुढापा तक, बिद्या ने हर उम्र को बहुत ही अच्छे से प्रस्तुत किये है। जीशु सेनगुप्ता जो कि शकुंतला देवी के पति के किरदार में है वो अपनी सादगी और सहजता से आपका दिल जीत लेंगे। वहीं, सान्या मल्होत्रा शकुंतला देवी के बेटी के किरदार अच्छे से निभाई है और किरदार में जच भी रही है। एक बेटी के मन में चल रही भावनाएं, गुस्सा, प्यार, आवेग.. हर एक्सप्रेशन को सान्या ने बहुत ही अच्छे से निभाया है। सान्या और अमित साध की जोड़ी अच्छी लग रही है। अपने छोटे से किरदार में अमित साध भी बेहतरीन कलाकारी से ध्यान खींच लेते हैं।

फ़िल्म के निर्देशन व तकनीकि साइड!

इतना आसान नही है बॉयोपिक बनाना। लेकिन शकुंतला देवी के जीवन को स्क्रीन पर अनु मेनन ने अच्छे तरह से दिखाने में सफल रही हैं। हाँ कुछ जगह पर कहानी भागती सी दिखाई देती है, शायद शकुंतला देवी की सारी अचीवमेंट को दिखाने की कोशिश में यह किया गया है। शकुंतला देवी की राजनीति और ज्योतिष शास्त्र की तरफ झुकाव को थोड़ा और दिखाया जा सकता था, क्योंकि कुछ सवाल उस पार्ट को लेकर रह जाते हैं। फिल्म की कहानी वर्तमान और पास्ट के बीच दिखाई देती है। मगर कंफ्यूज नहीं होंगे आप। अपनी मां और फिर अपनी बेटी के साथ शकुंतला देवी का रिश्ता इमोशनल उधेड़बुन लाता है। कई परतों में कहानी कही गई है, और हर परत अपने साथ अलग इमोशन का पूल लाती है।

एडिटिंग कुछ पार्ट्स में फिल्म को प्रभावी बना देती है, ये एडिटिंग अंतरा लाहिरी के द्वारा की गई है। वहीं, संवाद इशिता मोईत्रा ने लिखे हैं, ये भी जबरदस्त हैं। शंकुतला देवी एक सीन में अपनी रूठी हुई बेटी से कहती हैं, ‘शायद मैंने अपनीं मां को हमेशा मां के रूप में ही देखा, एक महिला के तौर पर कोशिश नहीं की समझने की।’ ये फिल्म इंटरेस्टिंग डॉयलोग्स से भरा हुआ है।

फ़िल्म का संगीत

सचिन- जिगर ने इस फ़िल्म का संगीत दिए है, जो कि कहानी के साथ अच्छे से आगे बढ़ती रहती है। वायु और प्रिया सरैया ने लिरिक्स लिखे है। कुल 4 गाने इस फ़िल्म में हैं। एक उत्साह गानों में है। मगर फिल्म खत्म होने के बाद वह उतना प्रभावी नहीं रह पाते है।

फ़िल्म में क्या अच्छा, क्या बुरा

एक समय ऐसा आता है फ़िल्म देखते हुए की, जब आप को होश नही रहता कि आप एक बॉयोपिक फ़िल्म देख रहे हैं। बल्कि विद्या बालन और उनके बेहतरीन अभिनय के चलते आपको फिल्म में दिलचस्पी रहती है। इसी कारण, एक्टिंग कहानी से ऊपर का जगह ले लेता है। खासकर इससे एक विश्व विख्यात एक गणितज्ञ की बॉयोपिक को बचाया जा सकता था।

फ़िल्म को देंखे या ना देंखे?

यह दिलचस्प सफर शकुंतला देवी का प्रेरणा योग्य है। ऐसी विलक्षण प्रतिभा विश्व में देखने को काफी कम ही मिली है। उनकी आकांक्षा और निर्भीक स्वभाव जो उनकी प्रतिभा से अलग है वो हमें काफी कुछ सिखाता है। वहीं, विद्या बालन के जबरदस्त एक्टिंग के चलते फिल्म ‘शकुंतला देवी’ एक जरूर ही देखी जानी चाहिए। यह भी कहना गलत नहीं होगा कि विद्या अपनी हरेक फिल्म में अभिनय का एक नया बेंचमार्क सेट कर देती हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *